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हमारी किताब खुली है, अब अपनी किताब खोलिए—महादलितों के नाम पर केवल राजनीति करने वाले, महादलितों के लिए काम करने वालों से काम का हिसाब मांग रहे हैं : डॉ. संतोष कुमार सुमन

पटना, 11/09/2026

हमारी किताब खुली है, अब अपनी किताब खोलिए—महादलितों के नाम पर केवल राजनीति करने वाले, महादलितों के लिए काम करने वालों से काम का हिसाब मांग रहे हैं : डॉ. संतोष कुमार सुमन

आजकल कुछ लोगों को दूसरों से हिसाब मांगने का बड़ा शौक चढ़ा हुआ है। मुझे यह देखकर थोड़ा आश्चर्य होता है कि जो लोग पिछले लगभग 60 वर्षों से सत्ता के केंद्र में रहे, सत्ता के फैसलों में भागीदार रहे, वे आज हमसे हिसाब मांग रहे हैं।

मैं उन्हें बहुत विनम्रता से कहना चाहता हूं कि पहले अपना राजनीतिक हिसाब-किताब लेकर आइए, फिर हमसे सवाल कीजिए।

हमारे नेता जीतन राम मांझी जी को जब-जब सरकार में काम करने का अवसर मिला, उन्होंने दलितों और महादलितों के लिए पूरी ईमानदारी और प्रतिबद्धता के साथ काम किया। उनके कार्यकाल में महादलितों के विकास के लिए जिस तरह योजनाएं बनीं और जमीन पर उतरीं, शायद ही देश में किसी एक मंत्री के कार्यकाल में दलितों और महादलितों के लिए इतना व्यापक काम हुआ होगा।

सच्चाई यह है कि हमें मुख्यधारा की सत्ता में काम करने का बहुत कम अवसर मिला। लेकिन जितना अवसर मिला, उसमें हमने यह दिखाने की कोशिश की कि सत्ता हमारे लिए केवल पद पाने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के सबसे कमजोर और वंचित व्यक्ति के जीवन में बदलाव लाने का माध्यम है।

और विडंबना देखिए—जो लोग दशकों तक सत्ता के हिस्सेदार रहे, जब हमने अपने हिस्से का हक मांगना शुरू किया तो उनके पेट में दर्द शुरू हो गया।

मैं उनसे पूछना चाहता हूं—हक मांगना गलत है या हक रोकना गलत है?

हम किसी का हक छीनने की बात नहीं कर रहे हैं। हम सिर्फ यह कह रहे हैं कि जो सबसे पीछे रह गया है, उसे भी उसके हिस्से का अधिकार और अवसर मिलना चाहिए।

और महादलित विकास के काम का हिसाब मांगने वालों के लिए मैं आज पूरा हिसाब सामने रख रहा हूं। 

महादलितों के लिए क्या-क्या काम हुआ—सरकारी रिकॉर्ड देख लीजिए

1. भूमिहीन महादलित परिवारों को आवासीय जमीन

महादलित परिवारों के लिए सबसे बड़ी समस्या थी—अपनी जमीन का न होना।

2009-10 से भूमिहीन महादलित परिवारों को 3 डिसमिल आवासीय भूमि उपलब्ध कराने की योजना लागू की गई।

11वीं पंचवर्षीय योजना में 2.75 लाख परिवारों को आवासीय जमीन उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया और इसके लिए ₹550 करोड़ का प्रावधान किया गया।

बाद के सरकारी रिकॉर्ड में 1,95,177 महादलित परिवारों को आवासीय प्लॉट उपलब्ध कराने तथा 5,717.39 एकड़ भूमि के वितरण का उल्लेख है।

इसका मतलब सिर्फ जमीन का एक टुकड़ा देना नहीं था। इसका मतलब था—एक भूमिहीन परिवार को अपने घर और स्थायी जीवन का आधार देना।

2. महादलित परिवारों के लिए आवास भूमिहीन महादलित परिवारों को आवासीय जमीन

जिन परिवारों को जमीन मिली, उनके घर बनाने की जरूरत भी थी। महादलित आवास योजना के तहत 1.95 लाख परिवारों को लाभ पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया और इसके लिए ₹780 करोड़ का प्रावधान किया गया। यानी जमीन के बाद घर और आवासीय सुरक्षा को भी विकास के केंद्र में रखा गया।

3. शौचालय—सम्मान और स्वास्थ्य दोनों 

महादलित परिवारों के लिए शौचालय निर्माण को अलग योजना के रूप में लिया गया।

सरकारी विभागीय रिकॉर्ड के अनुसार 3,47,776 परिवारों को शौचालय के लिए अनुदान दिया गया और लगभग ₹19.42 करोड़ खर्च किए गए। यह केवल एक निर्माण योजना नहीं थी। इसका सीधा संबंध स्वच्छता, स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन से था।

4. बच्चों के लिए पोशाक और शिक्षा

गरीब परिवार का बच्चा स्कूल जाए, उसके लिए छोटी-छोटी जरूरतें भी बड़ी बाधा होती हैं।

मुख्यमंत्री महादलित पोशाक योजना के तहत 14.71 लाख बच्चों को पोशाक दी गई और लगभग ₹80.8 करोड़ खर्च हुए। इसका उद्देश्य बच्चों को स्कूल से जोड़ना और परिवार पर पढ़ाई से जुड़े खर्च का बोझ कम करना था। 

5. हादलित युवाओं के लिए कौशल प्रशिक्षण

हमारा उद्देश्य केवल यह नहीं था कि गरीब परिवार सरकारी सहायता लेते रहें। युवा अपने पैरों पर खड़े हों, यह उससे भी ज्यादा जरूरी था।

इसी सोच के साथ दशरथ मांझी कौशल विकास योजना के माध्यम से विभिन्न ट्रेडों में रोजगारपरक प्रशिक्षण दिया गया सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार 2015-16 तक 2,19,971 महादलित परिवारों के व्यक्तियों को विभिन्न ट्रेडों में प्रशिक्षण दिया जा चुका था।

यानी सहायता से आगे बढ़कर कौशल और आत्मनिर्भरता की दिशा में काम किया गया।

6. विकास मित्र—सरकार और महादलित परिवार के बीच सीधा संपर्क

सरकारी योजनाएं बन जाएं, लेकिन अगर उनकी जानकारी गरीब परिवार तक नहीं पहुंचे तो योजना का लाभ कैसे मिलेगा?

इसीलिए विकास मित्र की व्यवस्था की गई। 9,875 विकास मित्र पद निर्धारित किए गए। इनका काम महादलित परिवारों और सरकार के बीच संपर्क कड़ी के रूप में काम करना था, ताकि लोगों को योजनाओं की जानकारी मिले और वे उसका लाभ उठा सकें। बाद में इस व्यवस्था में 50 प्रतिशत महिला आरक्षण भी रखा गया।

7. विकास रजिस्टर—परिवार तक पहुंच का रिकॉर्ड

महादलित परिवारों को केवल संख्या मानकर नहीं छोड़ा गया। उनके विकास की वास्तविक स्थिति जानने के लिए विकास रजिस्टर की व्यवस्था की गई।

इसमें यह देखने की व्यवस्था हुई कि परिवार को बिजली, पानी, आवास, शौचालय, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, खाद्य आपूर्ति और अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ मिला या नहीं। यानी सरकार की कोशिश यह रही कि योजना कागज पर पूरी होने के बजाय परिवार तक पहुंचे।

8. सामुदायिक भवन-सह-वर्कशेड

महादलित बस्तियों में सामुदायिक गतिविधियों और आजीविका के लिए सामुदायिक भवन-सह-वर्कशेड की योजना बनाई गई।

2010-11 से 2018-19 के बीच 4,870 इकाइयों का लक्ष्य रखा गया। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार 3,488 इकाइयों का निर्माण पूरा हो चुका था और 743 स्थानों पर काम जारी था।

इसका फायदा यह हुआ कि बस्तियों को सामुदायिक कार्यक्रमों और स्थानीय आजीविका से जुड़े कार्यों के लिए आधारभूत सुविधा मिली।

9. रेडियो—उस समय सूचना की सबसे बड़ी जरूरत

आज के दौर में मोबाइल और इंटरनेट सामान्य बात है, लेकिन उस समय गरीब और दूर-दराज के परिवारों तक सरकारी योजनाओं की जानकारी पहुंचाना बड़ी चुनौती थी। इसलिए महादलित परिवारों को रेडियो उपलब्ध कराने की योजना चलाई गई।

सरकारी विभागीय रिकॉर्ड के अनुसार 17,00,377 महादलित परिवारों को रेडियो उपलब्ध कराया गया और लगभग ₹67.9 करोड़ खर्च हुए। रेडियो के माध्यम से सरकारी योजनाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और सामाजिक जागरूकता की जानकारी घर तक पहुंचाने का प्रयास किया गया।

10. आंगनबाड़ी—बच्चों के पोषण और देखभाल पर ध्यान

महादलित बस्तियों में 3,000 आंगनबाड़ी केंद्रों का लक्ष्य रखा गया और इसके लिए ₹12 करोड़ का प्रावधान किया गया।

इसका उद्देश्य बच्चों के पोषण, प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा को मजबूत करना था।

11. क्रेच—कामकाजी महिलाओं के बच्चों के लिए सुविधा

कामकाजी महिलाओं के बच्चों की देखभाल के लिए क्रेच योजना को भी महादलित विकास कार्यक्रम का हिस्सा बनाया गया। इसके लिए ₹3.60 करोड़ का प्रावधान किया गया।

12. स्वास्थ्य सुविधा बस्तियों तक पहुंचाने का प्रयास

महादलित बस्तियों तक स्वास्थ्य सुविधा पहुंचाने के लिए धन्वंतरी मोबाइल चिकित्सा योजना को शामिल किया गया।

इसके लिए 11वीं पंचवर्षीय योजना में ₹75 लाख का प्रावधान था। उद्देश्य था कि कमजोर और दूरस्थ बस्तियों के लोगों को स्वास्थ्य सुविधा के लिए बहुत दूर न जाना पड़े।

13. महिलाओं को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना

महादलित विकास केवल पुरुषों तक सीमित नहीं था। नारी ज्योति कार्यक्रम के लिए ₹2 करोड़ का प्रावधान किया गया।

इसके साथ विकास मित्र व्यवस्था में 50 प्रतिशत महिला आरक्षण का प्रावधान रखा गया, ताकि महिलाओं की भागीदारी भी बढ़े। यह केवल योजनाओं की सूची नहीं थी

महादलित विकास के लिए 11वीं पंचवर्षीय योजना में ₹3,895.26 करोड़ की व्यापक परियोजना तैयार की गई थी। इसमें जमीन, आवास, पानी, सड़क, शौचालय, शिक्षा, स्वास्थ्य, आंगनबाड़ी, कौशल प्रशिक्षण, छात्रावास, सामुदायिक भवन और सामाजिक सशक्तीकरण को एक साथ जोड़ा गया।

यानी महादलित मॉडल का मतलब केवल किसी जाति को एक नाम दे देना नहीं था। महादलित मॉडल का मतलब था—जिसे सबसे कम मिला है, उसे सबसे ज्यादा लक्षित सहायता देकर आगे लाना।

और मैं यह भी स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि उस समय महादलित अवधारणा को सरकारी नौकरियों में SC आरक्षण के भीतर अलग महादलित कोटा के रूप में लागू नहीं किया गया था। महादलित मॉडल का मूल स्वरूप लक्षित कल्याणकारी विकास का था।

आज हम SC के भीतर उप-वर्गीकरण और ‘कोटे में कोटा’ की बात कर रहे हैं। यह एक अलग नीति और संवैधानिक विषय है। हमारी मांग का उद्देश्य किसी का अधिकार छीनना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि आरक्षण का लाभ उन सबसे वंचित लोगों तक भी पहुंचे, जो लंबे समय से पीछे रह गए हैं।

चाहे जितने हमले करिए, हमारा संकल्प नहीं बदलेगा

चाहे जितने हमले करिए, चाहे जितने प्रहार करिए, चाहे जितनी गालियां दिलवाइए, चाहे जितना मुर्दाबाद करवाइए—हम अपने संकल्प से पीछे हटने वाले नहीं हैं।

कोटे में कोटा गरीबों का हक है।
कोटे में कोटा 80 वर्षों के सामाजिक न्याय का हिसाब है।
कोटे में कोटा देना होगा—यह हमारा संकल्प है।

मैं यह बात फिर दोहरा देना चाहता हूं कि यह मेरी किसी व्यक्ति से व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है और न ही किसी राजनीतिक पार्टी के खिलाफ कोई अभियान है। अगर किसी को ऐसा लगता है तो यह उनकी गलतफहमी है।

हमारी राजनीति का उद्देश्य क्या है?

हम बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर के पथ पर चलते हैं। हमारे लिए राजनीति का मतलब केवल सत्ता हासिल करना नहीं है।

हमारा उद्देश्य उन लोगों तक विकास के काम और संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों की पहुंच बनाना है, जो सदियों से गरीबी, अस्पृश्यता, सामाजिक भेदभाव और मजबूरी की जिंदगी जीते आए हैं।

हम चाहते हैं कि बाबा साहब ने संविधान के माध्यम से जिन अधिकारों की व्यवस्था की, उन अधिकारों तक समाज के अंतिम व्यक्ति की भी पहुंच बने। वह सिर्फ अधिकारों का नाम सुनने वाला व्यक्ति न रहे, बल्कि अपने अधिकार का वास्तविक हिस्सेदार बने।

इसमें किसी को बुरा लगने की कोई बात नहीं होनी चाहिए। राजनीति में मतभेद हो सकते हैं, विचारों का विरोध हो सकता है, लेकिन व्यक्तिगत तिरस्कार और द्वेष की राजनीति उचित नहीं है। हमारा संघर्ष किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं है। हमारा संघर्ष उस असमानता के खिलाफ है जिसने सदियों तक समाज के एक बड़े हिस्से को पीछे रखा।

अब अपना हिसाब दीजिए

इसलिए जो लोग हमसे हिसाब मांग रहे हैं, मैं उनसे कहना चाहता हूं— हिसाब जरूर मांगिए। लोकतंत्र में आपको पूरा अधिकार है। लेकिन अपना हिसाब देने के लिए भी तैयार रहिए। पिछले लगभग 60 वर्षों तक सत्ता में भागीदारी रखने वालों से मेरा सीधा सवाल है—

दलितों के लिए आपने क्या किया?
कितने भूमिहीन परिवारों को जमीन दी?
कितनों को आवास दिया?
कितने बच्चों को शिक्षा और पोशाक दी?
कितने युवाओं को कौशल और रोजगार से जोड़ा?
कितनी दलित बस्तियों में सड़क, पानी और शौचालय पहुंचाया?
कितने सामुदायिक भवन बनवाए?
कितने परिवारों को सरकारी योजनाओं से जोड़ा?

हमारा हिसाब सरकारी वेबसाइट पर मौजूद है। बिहार सरकार के विभागों के दस्तावेजों में मौजूद है। योजनाओं के आंकड़ों में मौजूद है और उन परिवारों के जीवन में मौजूद है जिन्हें इन योजनाओं का लाभ मिला।

इसलिए कभी दूसरों का हिसाब मांगने और गाल बजाने से फुरसत मिले तो बिहार सरकार की वेबसाइट खोलकर देख लीजिए। एक-एक योजना और उसका रिकॉर्ड मिल जाएगा।

हमने अपना हिसाब सामने रख दिया है। अब आपकी बारी है। भाषण का नहीं—काम का हिसाब दीजिए।

हमारी किताब खुली है। अब अपनी किताब भी जनता के सामने खोलिए।

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